मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु ‘श्री राम’की द्वादश कलाएं[3]

               चित्र ‘YT CREAT’ के सहयोग से प्राप्त है। इसमें ‘अनासक्ति’ कलाका चित्रण दो बार हुआ है।

                            भगवान श्रीराम की 12 कलाएं मुख्य रूप से मानवीय मर्यादा, धर्म और आदर्श शासन से जुड़ी हैं। 

चंद्रमा और सूर्य की कलाओं का अवतारों से सीधा संबंध उनके वंश के आधार पर तय होता है। भगवान श्रीराम सूर्यवंशी थे और भगवान श्रीकृष्ण चंद्रवंशी थे। 

श्रीराम की 12 कलाएं कौन सी हैं?

शास्त्रों और विद्वानों के अनुसार, प्रभु श्रीराम की 12 कलाएं उनके उत्तम चरित्र के गुणों को दर्शाती हैं: 

प्रथमा (दृढ़ता): विपरीत परिस्थितियों में भी अपने धर्म और मार्ग पर अडिग रहना।

धैर्य: वनवास, युद्ध और संकट के समय भी मन को शांत रखना।

करुणा (दया): शत्रु (जैसे मरते समय रावण) और पशु-पक्षियों (जटायु, सुग्रीव) पर भी दया करना।

न्यायप्रियता: राजा के रूप में हमेशा निष्पक्ष और सही न्याय करना।

सत्यधर्म: प्राण जाए पर वचन न जाए, सत्य का हमेशा पालन करना।

शौर्य (साहस): महाबली राक्षसों और रावण की विशाल सेना से बिना डरे युद्ध करना।

मर्यादा: समाज और परिवार के नियमों व दायित्वों को पूरी तरह निभाना।

अनासक्ति: राजपाठ और महलों के सुख को एक पल में छोड़कर वन चले जाना।

प्रजापालन: अपनी प्रजा के सुख को अपना परम धर्म मानना (रामराज्य)।

विवेक: सही और गलत का हमेशा गहरा ज्ञान रखना।

तेज: ऐसा दिव्य व्यक्तित्व जिसे देखकर दुष्ट भी थर-थर कांपें और भक्त सम्मोहित हो जाएं।

शरणरक्षक: जो भी शरण में आए (जैसे विभीषण), उसे अभय दान देना। 

आगे हम सूर्य देव और चन्द्र देवकी कलाओं पर चर्चा करेंगे।

 Post –4 >>

पौराणिक और धार्मिक दृष्टिकोण भारतीय ग्रंथों में कला: पौराणिक और धार्मिक दृष्टिकोण[2]

 योगेश्वर श्री कृष्ण 


(सोलह कलाओंसे मण्डित)

अब हम अवतारों की कालाओं के आध्यात्मिक धर्म सम्मत जानकारी पर आते है—

अवतारों में कलाओंका विवरण 

विभिन्न ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार मुख्य अवतारों में कलाओं की संख्या इस प्रकार है:

 
अवतार का नाम  
 औरमहत्त्व / विशेषता
मत्स्य, कूर्म, वराह1 से 2 कला (कुछ कथाओं में 10-11 आवेश कलाएं)मुख्य रूप से संकट से रक्षा और जीव चेतना की शुरुआत के लिए।
नरसिंह अवतार1 से 3 कला (विशिष्ट परिस्थिति हेतु)केवल हिरण्यकश्यप के वध और प्रहलाद की रक्षा के लिए प्रकट हुए।
वामन अवतार2 से 3 कलाराजा बलि के अहंकार को तोड़ने के लिए ब्राह्मण रूप।
परशुराम अवतार3 से 5 कलादुष्ट क्षत्रियों के संहार के लिए आवेश रूप।
राम अवतार12 कलामर्यादा पुरुषोत्तम रूप। मानव सीमाओं में रहकर आदर्श जीवन जीना था।
कृष्ण अवतार16 कला (पूर्णावतार)चंद्रवंशी रूप। इसमें ईश्वर की सभी शक्तियां और लीलाएं समाहित थीं।
बुद्ध अवतार5 से 8 कलासमाज को शांति और अहिंसा का मार्ग दिखाने के लिए।
कल्कि अवतार4 से 8 कलाकलयुग के अंत में केवल पापियों के संहार के उद्देश्य से प्रकट होंगे।

 ध्यातव्य: सामान्य मनुष्यों में केवल 5 से 6 कलाएं ही सक्रिय होती हैं, जबकि महान संतों में यह 7 से 8 कलाओं तक हो सकती हैं। आठ से अधिक कलाओं का तेज केवल दिव्य देह ही संभाल सकती है. 

 


 श्रीकृष्ण में मौजूद 16 मुख्य दिव्य गुण (कलाएं) इस प्रकार हैं: 

1.दया: हर जीव के प्रति करुणा रखना।

2.धैर्य: कठिन समय में भी विचलित न होना।

3.क्षमा: शत्रु या गलती करने वाले को माफ करना।

4.न्याय: हमेशा धर्म और न्याय का साथ देना।

5.निरपेक्षता (निष्पक्षता): बिना किसी भेदभाव के काम करना।

6.निरासक्ति: सुख-दुख और मोह से दूर रहना।

7.तपस्या: परम आत्मिक और आध्यात्मिक शक्ति होना।

8.अपराजेय: कोई भी शक्ति परास्त न कर सके।

9.दानशीलता: सब कुछ दान करने की क्षमता (जैसे सुदामा को तीन लोक दिए)।

10.सौंदर्यमय: रूप और व्यवहार से सबको मोहित करना।

11.नृत्यकला: नृत्य और उत्सवों के ज्ञाता (रासलीला)।

12.संगीतज्ञ: बांसुरी की धुन से पूरी सृष्टि को आनंदित करना।

13.नीतिवादी: कूटनीति और सही मार्ग का ज्ञान (महाभारत में मार्गदर्शन)।

14.सत्यवादी: हमेशा सत्य के मार्ग पर अडिग रहना।

15.सर्वज्ञता: भूत, भविष्य और वर्तमान की सब बातें जानना।

16.सर्वनियंता: पूरी सृष्टि को नियंत्रित करने की असीम क्षमता। 

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कला क्या है? जानिए कला का वास्तविक अर्थ और महत्व –[ 1.]

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     'कला' शब्द सुनते ही हमारे मन में चित्रकारी, संगीत या नृत्य की छवि उभरती है, लेकिन इसका दायरा सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। कला मानव मन की सुंदर अभिव्यक्ति है जो जीवन को जीने योग्य और सुसंस्कृत बनाती है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों से लेकर आधुनिक युग तक, कला की परिभाषा और इसके रूपों में गहरा बदलाव आया है। आइए, इस लेख में जानते हैं कि कला का वास्तविक अर्थ क्या है और यह हमारे जीवन को किस तरह प्रभावित करती है।


     कला (Art) वह सुंदर रचना है जिसे इंसान अपनी सोच और कल्पना से बनाता है। कला को रचने वाले इंसान को कलाकार (Artist) कहते हैं, और उनके द्वारा बनाई गई सुंदर रचना को कलाकृति (Artwork) कहते हैं। 

कला और कलाकार के मुख्य रूप
  • चित्रकला: रंगों और कागज़ या कपड़े पर बनाई गई सुंदर तस्वीर।
  • मूर्तिकला: पत्थर, मिट्टी या धातु को तराश कर बनाई गई मूर्ति।
  • हस्तकला: हाथ से बनाई गई पारंपरिक और उपयोगी वस्तुएं। 
कलाकृति का महत्व
  • यह मन के भावों को दुनिया के सामने रखती है।
  • यह हमारी पुरानी संस्कृति और इतिहास को ज़िंदा रखती है।
  • यह समाज को जोड़ने और नया संदेश देने का काम करती है। 

‘कला’ शब्द —

संस्कृत में 'कला' शब्द की उत्पत्ति 'कल्' धातु से मानी जाती है, जिसका अर्थ है—'प्रेरित करना', 'शब्द करना' या 'गणना करना'। फाई

   'कला' का  धर्म सम्मत अर्थ भगवान की दिव्य शक्तियों, चेतना के स्तर और गुणों से है। भगवान विष्णु के अलग-अलग अवतारों में उनकी कलाओं की अभिव्यक्ति उनके अवतरण के उद्देश्य पर निर्भर करती थी। शास्त्रों में संपूर्ण 16 कला का वर्णन है।भगवान श्रीकृष्ण एकमात्र ऐसे अवतार हैं जो सभी 16 कलाओं से पूर्ण थे, इसलिए उन्हें 'पूर्णावतार' कहा जाता है।      

      ऐहिक दृष्टि से  भारतीय ग्रंथोंमें वर्णित 64 कलाएं मनुष्य के सर्वांगीण विकास, सुखी, और आदर्श सांसारिक जीवन का आधार हैं,  जीवन को सुगम, संस्कारित और कुशल बनाने वाले व्यावहारिक कौशल हैं।

  आज इसी बहाने कुछ ज्ञान वृद्धि कर ली जाए। क्या आप को ज्ञात है कि सप्त ऋषि मंडल के परम पूज्य ऋषिगण भी परमानेंट नहीं हैं? जी हां यही सच है।  ...